लेखक: मौलाना सैयद करामत हुसैन शऊर जाफ़री
हौज़ा न्यूज़ एजेंसी I आज ईद है, लेकिन यह कैसी ईद है कि हवा में खुशबू नहीं, बारूद की महक है; तकबीरों की जगह चीखें हैं और गले मिलने की जगह कफ़न में लिपटी लाशें एक-दूसरे के बगल में पड़ी हैं।
इस दुख के शोर में, एक ऐसा दीया बुझ गया है जिसकी रोशनी सिर्फ़ एक देश के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी कौम के लिए उम्मीद की किरण थी—शहीद नेता। वह सिर्फ़ एक इंसान नहीं बल्कि एक सोच, एक दिशा और एक जीता-जागता ज़मीर थे। उनकी मौजूदगी मज़लूमों के लिए एक ढाल और ज़ालिमों के लिए एक चुनौती थी।
ईद पर नज़ारा कुछ और था—तेहरान की हवा तकबीरों से गूंज रही थी, लाखों दिल एक जगह धड़क रहे थे, और दुआओं के उठे हुए हाथ आसमान को छू रहे थे। लेकिन आज, वही शहर खामोश है; सफ़ें खड़ी हैं, पर दिल टूटे हुए हैं, आँखें इंतज़ार कर रही हैं, पर दरवाज़ा खामोश है। वो इमाम, जिनकी इबादत इबादत को एहसास में बदल देती थी, आज उसी मिट्टी के आगोश में हैं।
यह सब सिर्फ़ एक हादसा नहीं है…
यह उस ऑर्गनाइज़्ड बेरहमी का नतीजा है जिसे दुनिया पावर बैलेंस कहकर छिपाती है। शैतानी ताकतें—अमेरिका और इज़राइल—अपनी ताकत के नशे में इंसानियत को रौंद रही हैं; बमबारी सिर्फ़ इमारतों पर नहीं, बल्कि इंसान की इज़्ज़त पर हो रही है। स्कूल, हॉस्पिटल, घर—सब उनकी बेरहमी का निशाना हैं। यह जंग नहीं, बल्कि ज़िंदगी की हर उम्मीद का कत्ल है।
इस क्रूरता के बीच वो नेता निशाना बन गया…
और उसकी शहादत सिर्फ़ एक जान का जाना नहीं, बल्कि एक वादे का टूटना है। ऐसा लगता है जैसे देश का सिर झुक गया हो और कारवां का झंडा ज़मीन पर गिर गया हो। वो नेता जो रातों को जागकर देश के दर्द में आंसू बहाता था, जो अपना आराम कुर्बान करके दबे-कुचले लोगों के लिए खड़ा होता था, आज चुप करा दिया गया है।
ईरान की ज़मीन पर मासूम बच्चों का खून बहा है—कलम पकड़ने निकले नन्हे हाथ कफ़न में लपेट दिए गए हैं; मांओं की गोदें छीन ली गई हैं, और पिताओं के कंधों पर आने वाले जनाज़े आ गए हैं। हज़ारों घायल हैं, जिनके ज़ख्म सिर्फ़ शरीर पर नहीं, बल्कि रूह पर हैं। पानी, बिजली, अस्पताल—यहां तक कि ज़िंदगी के साधनों पर भी हमला हो रहा है, जैसे हर दरवाज़े पर मौत का पहरा लगा हो।
और यहां लेबनान में…
वो भी उसी ज़ुल्म की गिरफ़्त में है; बस्तियां तबाह हो रही हैं, बच्चे धूल में पड़े हैं, मांएं रो रही हैं। इसे दूसरा गाजा बनाने की कोशिश हो रही है, और दुनिया की चुप्पी इस ज़ुल्म का सबसे बड़ा सहारा है।
लेकिन इन सभी ज़ख्मों में सबसे गहरा ज़ख्म इस लीडर से जुदाई है, क्योंकि एक लीडर को मारना सिर्फ़ एक इंसान को मारना नहीं है, बल्कि एक दिशा, एक भावना और एक सामूहिक चेतना को ज़ख्म देना है।
आज ईद है… लेकिन इस लीडर के बिना यह कैसी ईद?
यह कोई जश्न नहीं, बल्कि एक अनाथ देश की खामोश चीख है।
हे अल्लाह! इस शहीद लीडर को अपने पास जगह दे, उसके खून को देश की जागृति बना, और हमें उस सच्चाई के रास्ते पर मज़बूत रख जिस पर वह चला।
आमीन…
أَلَیْسَ الصُّبْحُ بِقَرِیبٍ؟
आपकी टिप्पणी